सफलता का रहस्य
विलियम शेक्सपियर ने कहा था की "हमारी शंकाए इतनी विश्वासघातनी हैं की वे हमें प्रयास करने से भी रोक देती हैं और हम सभी मोर्चों पर असफल हो जाते हैं जहां पर हम जीत सकते हैं।"
ज्यादातर लोग सफलता न पाने का कारण अपनी परिस्तिथियों को देते हैं किसी भी क्षेत्र में वही सफ़ल व्यक्ति है जिसनें स्वयं ही अपने लिये अनुकूल परिस्थितियाँ बनाईं, हम वही बनते हैं जिसके बारे में सोचते हैं, इसलिए हमें ठोस और सार्थक लक्ष्य के बारें में पहले से सोचना है। और दूसरी ओर वह व्यक्ति है जिसे अपने लक्ष्य के बारे में कोई जानकारी नही है अर्थात् संशय में जीवन बनाये रखे है उसे नही पता की कहाँ जाना है तो वह वैसे ही हो जाएगा जैसा सोच रहा है और कुछ भी नही बन पायेगा।
अब हम आत्मशोध करें की, ये सब कैसे हो जाता है? कि जैसा हम सोच रहें हैं वैसा ही आसपास का वातावरण बन जाता है।
हम कल्पना करते हैं की एक किसान है, जिसके पास थोड़ी सी जमीन है वह जमीन बड़ी ही उपजाऊ है उसमें क्या बोना है यह किसान पर निर्भर करता है और इससे जमीन को कोई मतलब नही है। ठीक ऐसे ही हमारे मन को हमसे कोई स्वार्थ नही है की हम क्या सोचते हैं बस जो हम मन रूपी जमीन में बोएंगे वही हमें अंतोगत्वा मिलेगा। और यहीं सकरात्मक और नकारात्मक विचार लागू होते हैं। अब, किसान के पास चलते हैं उसके पास दो प्रकार के बीज हैं एक अन्न का और दूसरा विषैला, किसान दोनो को बो देता है और जब फसल तैयार होती है तो आप परिणाम समझ सकते हैं।आपको ज्ञात है की जमीन को इस बात से कोई मतलब नही है की आपने अन्न पाया की ज़हर। ठीक इसी प्रकार मानव मन भी काम करता है, आपने जो इसमें डाला वही आपको मिला।
मानव मस्तिष्क इस धरती का इकलौता ब्रह्माण्ड है जिसकी कोई सीमा नही है इस पर आजतक अन्वेषण नही हुआ है, यह हमारे कल्पनाशक्ति से भी तेज है आप इसमें सकरात्मक विचार डालते हैं तो आपको कहीं अधिक सुखसमृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करेगा। यह यन्त्र हमें जन्म से ही नि:शुल्क मिला हुआ है और यही कारण है इसका हम मोल नही करते, और हम पैसे से आई वस्तु को ज्यादा महत्व देते हैं जबकि ठीक इसके विपरीत होता है आज जो भी हमारे जीवन के लिये महत्वपूर्ण है वह सभी चीजें नि:शुल्क ही उपलब्ध हैं हमारा परिवार, हमारी प्रकृति, हमारी सोच ये सभी। जबकि पैसे से मिली चीजों को हम बदल सकते हैं । कुल मिलाकर मानव मन और मस्तिष्क हमने पूर्ण रूप से उपयोग नही किया है। वैज्ञानिकों के शोधों से पता चला की हमने मस्तिष्क का केवल मात्र 10 प्रतिशत ही उपयोग किया है।
अत: आप विचार किजीये की अब आपको क्या करना है? आप बिना विलंब किये अपने लक्ष्य को मस्तिष्क में बो दिजीये और जो भी व्यक्ति अपने अथक परिश्रम और सकरात्मक सोच के साथ लक्ष्य को साधे रहेगा वह अवश्य की एक दिन सफलता के शिखर में पहुँच कर अपना और विश्व निर्माण में सहायक होगा। कोई भी व्यक्ति तब तक समृद्धि नही पा सकता जब तक की वो औरों की सेवा न करे; रही बात परिश्रम से मिला पैसा, मात्र आपके लिये एक प्रकार का भत्ता अथवा मानदेय होना चाहिए।
आप किसी को दरकिनार कर सफलता और सत्ता पा लें; तो ये आपकी भूल है सेवा भाव आपके व्यक्तिगत विकास का सदैव अभिन्न हिस्सा होना ही चाहिए। यह आपके श्वास लेने जैसा ही है, जितना आप लेंगे उतना ही छोड़ेंगे। आप इस नियम को पलट सकतें हैं ऐसा भूलकर भी मत सोचिये, क्योंकि यह असम्भव है।
इसलिए एक निश्चित लक्ष्य का निर्धारण करें, अपने को कम आकने वाली नकारात्मक सोच का नकारें और उन सभी कारणों पर विचार करें जो सदैव ही आशंकित करते हों की आप सफ़ल नही हो सकते, वरन इसके उलट यह सोचना की कैसे कैसे सफलता को पाया जाय। और अगर नकारात्मक इतना हावी है की निकल ही नही रहा तब भूत में जाकर उनको ढ़ूढ़ना होगा की, सबसे पहले कब यह विचार आया? इसके बाद जिसे भी आदर्श अपने लक्ष्य के लिये मानते हैं उसे अक्षरस: अनुसरण करें। और अभी तक के मानवविकास में जितने भी लोग योगदान दिये हैं उनसे सीखे और अपने उपर सकारात्मक विचार को बनाये रखें, इसका प्रायोगिक परिक्षण निरंतर करते हुये अपने को आत्माशात करते रहें।
अब पायेंगे कि अनिश्चित काल के लिये आप सफ़ल हो रहें हैं।
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