हमारी चेतना
प्रकृति को समझने के लिये प्रकृति ने जो हमे लूप दिया है वही चेतना है।
चेतना हर एक लिये बिल्कुल अलग है, जैसा आप अपने आसपास को महसूस करते हैं वैसा मैं नही करता। वास्तविकता से विपरीत दृष्टिकोण होगा आपका और मेरा। लेकिन फिर भी मानवों का सोचना लगभग मिलान कर ही जाता है, पर क्या हमारे और जानवरों के बीच भी ऐसा होता होगा?
चलिये! अपने पालतू जानवारों से कुछ समझा जाये, क्या वो भी ऐसा ही करते हैं? जब मैने अपने पालतू को देखा तो मुझे एक अनुभूति हुई, परन्तु क्या यही अनुभव वे भी करते होंगे, तो ऐसा कदापि नही होता। प्रसिद्ध क्वांट्म भौतिकशास्त्री मेचियो काकू का कहना है की जीवों के चेतना को मापा जा सकता है। मानव चेतना का तीन स्तर होता है और दो तो जानवरों से ही मिला है, मानव के विकास (कपि से मानव बनने की प्रक्रिया) में सरीसृप से फिर स्तनधारियों से जो मिला है वह सूर्य के गति तक का ही मिलता है अर्थात् जानवारों से पूरे दिन का चेतना हमे मिल पाता है। लेकिन, अन्तिम स्तर स्वयं हमारे अंदर है, जो की भविष्य का भी सोच सकता हैं हम कठिन समस्या में अपने मस्तिष्क का उपयोग कर उसे सुलझा लेते हैं वर्तमान को महसूस कर भविष्य के लिये तत्पर हो जाते हैं।
इसलिये हम मानव भाग्यशाली हैं दूसरे प्राणीयों से, क्योंकि अनगिनत वर्षों के क्रमिक विकास के बाद हमारा दिमाक और अधिक विकसित हो गया है, इसी चेतना की शक्ति के कारण हम; आग जलाने; पहिया बनाने से लेकर कम्प्यूटर तक पहुँच गये, हमने जाना की हमारी चेतना केवल मात्र पेट भरने तक ही सीमित नही है।
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